हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.164.22

मंडल 1 → सूक्त 164 → श्लोक 22 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
यस्मि॑न्वृ॒क्षे म॒ध्वदः॑ सुप॒र्णा नि॑वि॒शन्ते॒ सुव॑ते॒ चाधि॒ विश्वे॑ । तस्येदा॑हुः॒ पिप्प॑लं स्वा॒द्वग्रे॒ तन्नोन्न॑श॒द्यः पि॒तरं॒ न वेद॑ ॥ (२२)
जिस आदित्य रूपी वृक्ष पर जल भक्षण करने वाली किरणें रात को पक्षियों के समान बैठती हैं एवं प्रातः उदय काल में विश्व को प्रकाश देती हैं, विद्वान्‌ लोग उस पालक सूर्य का फल रस वाला बताते हैं. जो पालक सूर्य को नहीं जानता, वह इस फल को नहीं पा सकता. (२२)
On the aditya tree on which the water-eating rays sit like birds at night and give light to the world in the morning, scholars describe that the fruit of that spinach sun is juiced. He who does not know the spinach sun cannot find this fruit. (22)