हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.164.30

मंडल 1 → सूक्त 164 → श्लोक 30 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
अ॒नच्छ॑ये तु॒रगा॑तु जी॒वमेज॑द्ध्रु॒वं मध्य॒ आ प॒स्त्या॑नाम् । जी॒वो मृ॒तस्य॑ चरति स्व॒धाभि॒रम॑र्त्यो॒ मर्त्ये॑ना॒ सयो॑निः ॥ (३०)
अपने कार्यो के लिए शीघ्रगति वाला जीव सांस लेता हुआ सोता है और अपने घररूपी शरीर में निश्चिंत रूप से रहता है. मरणशील शरीर के साथ उत्पन्न शरीर का मरणरहित स्वधा के द्वारा विचरण करता है. (३०)
The organism, which is quick to move for its actions, sleeps and lives peacefully in its domestic body. The body produced with the mortal body is moved by the deathless swadha. (30)