हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.164.31

मंडल 1 → सूक्त 164 → श्लोक 31 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
अप॑श्यं गो॒पामनि॑पद्यमान॒मा च॒ परा॑ च प॒थिभि॒श्चर॑न्तम् । स स॒ध्रीचीः॒ स विषू॑ची॒र्वसा॑न॒ आ व॑रीवर्ति॒ भुव॑नेष्व॒न्तः ॥ (३१)
सबके रक्षक एवं कभी दुःखी न होने वाले सूर्य को मैं अंतरिक्ष में आते-जाते देखता हूं. वह सूर्य अपने साथ जाने वाली एवं पीछे हटने वाली किरणों को लपेटे हुए भुवनों के मध्य बार-बार आते-जाते हैं. (३१)
I see the sun coming and going into space, the protector of all and the never-to-be-sad sun. The sun comes and goes again and again between the eyebrows wrapped with the rays that go with it and retreat. (31)