हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.164.38

मंडल 1 → सूक्त 164 → श्लोक 38 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 164
अपा॒ङ्प्राङे॑ति स्व॒धया॑ गृभी॒तोऽम॑र्त्यो॒ मर्त्ये॑ना॒ सयो॑निः । ता शश्व॑न्ता विषू॒चीना॑ वि॒यन्ता॒ न्य१॒॑न्यं चि॒क्युर्न नि चि॑क्युर॒न्यम् ॥ (३८)
मरणरहित आत्मा मरणधर्मा शरीर के साथ रहती है एवं अन्रादि भोगों के कारण अधोगति और ऊर्ध्वगति को प्राप्त होता है. वे दोनों सदा एक साथ रहते हैं और संसार में सभी जगह साथ-साथ जाते हैं. लोग इनमें से अनित्य शरीर को जानते हैं, नित्य आत्मा को नहीं. (३८)
The soul without death lives with the mortal body and attains degradation and vertical motion due to the inner enjoyments. They are always together and go together everywhere in the world. People know of these the eternal body, not the eternal soul. (38)