हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.165.10

मंडल 1 → सूक्त 165 → श्लोक 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 165
एक॑स्य चिन्मे वि॒भ्व१॒॑स्त्वोजो॒ या नु द॑धृ॒ष्वान्कृ॒णवै॑ मनी॒षा । अ॒हं ह्यु१॒॑ग्रो म॑रुतो॒ विदा॑नो॒ यानि॒ च्यव॒मिन्द्र॒ इदी॑श एषाम् ॥ (१०)
इंद्र बोले-“मुझ अकेले की ही शक्ति सब जगह फैले. मैं मन से जो भी इच्छा करूं, वही काम कर सकूं. हे मरुतो! मैं उग्र एवं विद्वान्‌ हूं. जिन संपत्तियों को मैं जानता हूं, उन पर मेरा ही अधिकार है.” (१०)
Indra said, "The power of me alone spread all over the place. Whatever I want from my heart, I can do the same thing. O Maruto! I'm fierce and learned. I have the right to the properties I know." (10)