हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.165.8

मंडल 1 → सूक्त 165 → श्लोक 8 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 165
वधीं॑ वृ॒त्रं म॑रुत इन्द्रि॒येण॒ स्वेन॒ भामे॑न तवि॒षो ब॑भू॒वान् । अ॒हमे॒ता मन॑वे वि॒श्वश्च॑न्द्राः सु॒गा अ॒पश्च॑कर॒ वज्र॑बाहुः ॥ (८)
इंद्र ने कहा-“हे मरुद्गण! मैंने क्रोध युक्त होकर अपने निजी बल से वृत्र को मारा था, मैं वज्र अपने हाथ में रखता हूं, इसलिए मैं समस्त मनुष्यों की प्रसन्नता के लिए वर्षा करता हूं.” (८)
Indra said, "O deserters! I had struck Vritra with my own personal force out of anger, I hold the thunderbolt in my hand, so I rain for the happiness of all men." (8)