हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.166.10

मंडल 1 → सूक्त 166 → श्लोक 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 166
भूरी॑णि भ॒द्रा नर्ये॑षु बा॒हुषु॒ वक्ष॑स्सु रु॒क्मा र॑भ॒सासो॑ अ॒ञ्जयः॑ । अंसे॒ष्वेताः॑ प॒विषु॑ क्षु॒रा अधि॒ वयो॒ न प॒क्षान्व्यनु॒ श्रियो॑ धिरे ॥ (१०)
मानवों का कल्याण करनेवाली अपनी भुजाओं में मरुद्गण कल्याणकारी अनंत पदार्थ धारण करते हैं. उनके वक्षस्थलों पर कांतिमय एवं स्पष्ट दीखने वाले स्वर्णाभूषण, कंधों पर श्वेत मालाएं, वज्र के समान आयुधों पर छुरा एवं पक्षियों के पंखों के समान शोभा धारण करते हैं. (१०)
In their arms that do good to human beings, the deserts hold infinite objects of welfare. On their breasts, they adorn the golden ornaments with a radiant and clear appearance, white garlands on their shoulders, stabs on the arms like thunderbolts and the wings of birds. (10)