हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.174.3

मंडल 1 → सूक्त 174 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 174
अजा॒ वृत॑ इन्द्र॒ शूर॑पत्नी॒र्द्यां च॒ येभिः॑ पुरुहूत नू॒नम् । रक्षो॑ अ॒ग्निम॒शुषं॒ तूर्व॑याणं सिं॒हो न दमे॒ अपां॑सि॒ वस्तोः॑ ॥ (३)
हे बहुतों द्वारा स्तुत्य इंद्र! तुम असुरों द्वारा रक्षित पुरियों को जीतते जाते हो. तुम वहां से मरुत्‌ आदि अनुचरों सहित स्वर्ग में जाते हो. वहां तुम अशांत एवं शीघ्रगंता अग्नि की इसलिए रक्षा करते हो कि वे यज्ञगृह में अपना यज्ञकर्म पूरा कर सकें. जैसे सिंह वन की रक्षा करता है, उसी प्रकार तुम अग्नि की रक्षा करते हो. (३)
O Indra praised by many! You continue to conquer the puris protected by the asuras. From there you go to heaven with attendants like desert etc. There you protect the turbulent and fast-paced fire so that they can complete their yajnakarma in the yajnagriha. Just as a lion protects the forest, so do you protect the fire. (3)