हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.177.3

मंडल 1 → सूक्त 177 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 177
आ ति॑ष्ठ॒ रथं॒ वृष॑णं॒ वृषा॑ ते सु॒तः सोमः॒ परि॑षिक्ता॒ मधू॑नि । यु॒क्त्वा वृष॑भ्यां वृषभ क्षिती॒नां हरि॑भ्यां याहि प्र॒वतोप॑ म॒द्रिक् ॥ (३)
हे इंद्र! अपने कामवर्षी रथ पर बैठो, क्योंकि तुम्हारे लिए निचोड़ा हुआ सोमरस और मधुर घृत तैयार है. हे कामवर्षी इंद्र! अपने घोड़ों को रथ में जोड़ो और सत्कर्म करने वाले यजमानों पर अनुग्रह करने के लिए शीघ्रगामी रथ से हमारे सम्मुख आओ. (३)
O Indra! Sit on your workman's chariot, because the squeezed somras and the sweet abomination is ready for you. O karyati Indra! Join your horses in the chariot and come before us in a fast-moving chariot to do favor to the hosts who do good deeds. (3)