ऋग्वेद (मंडल 1)
न॒दस्य॑ मा रुध॒तः काम॒ आग॑न्नि॒त आजा॑तो अ॒मुतः॒ कुत॑श्चित् । लोपा॑मुद्रा॒ वृष॑णं॒ नी रि॑णाति॒ धीर॒मधी॑रा धयति श्व॒सन्त॑म् ॥ (४)
“हे पत्नी! मैं मंत्रों के जप और ब्रह्मचर्य पालन में लगा रहा. फिर भी न जाने किस कारण मुझमें काम भाव उत्पन्न हो गया. तुम लोपामुद्रा वीर्य सेचन समर्थ मुझ पति के साथ संगत हो जाओ. तुम अधीर नारी बनकर मुझ महाप्राण पुरुष का भोग करो.” (४)
"O wife! I kept engaged in chanting of mantras and observing celibacy. Yet don't know why I got a sense of work. You enable Lopamudra Semen To be compatible with my husband. You become an impatient woman and enjoy me as a great man." (4)