हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.185.3

मंडल 1 → सूक्त 185 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 185
अ॒ने॒हो दा॒त्रमदि॑तेरन॒र्वं हु॒वे स्व॑र्वदव॒धं नम॑स्वत् । तद्रो॑दसी जनयतं जरि॒त्रे द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त् ॥ (३)
हे धरती और आकाश! हम अदिति से जिस पापरहित, अक्षीण, स्वर्ग के तुल्य हिंसाशून्य एवं अन्नयुक्त धन की प्रार्थना करते हैं, तुम वही धन स्तुतिकर्तता यजमानों को देते हो. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (३)
O earth and sky! The sinless, unbreakable, unspeakable, violence-free and food-rich wealth that we pray to Aditi, you give the same wealth to the hosts. O earth and sky! Save us from sin. (3)