हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.185.4

मंडल 1 → सूक्त 185 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 185
अत॑प्यमाने॒ अव॒साव॑न्ती॒ अनु॑ ष्याम॒ रोद॑सी दे॒वपु॑त्रे । उ॒भे दे॒वाना॑मु॒भये॑भि॒रह्नां॒ द्यावा॒ रक्ष॑तं पृथिवी नो॒ अभ्वा॑त् ॥ (४)
प्रकाशयुक्त दिन और रात्रि के दोनों प्रकार के धन के लिए दुःखरहित एवं अन्न द्वारा रक्षा करने वाले धरती और आकाश का हम अनुगमन करें. हे धरती और आकाश! हमें पाप से बचाओ. (४)
Let us follow the earth and the sky, which are without sorrow and protected by food for both the riches of the light day and the night. O earth and sky! Save us from sin. (4)