हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.186.6

मंडल 1 → सूक्त 186 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 186
उ॒त न॑ ईं॒ त्वष्टा ग॒न्त्वच्छा॒ स्मत्सू॒रिभि॑रभिपि॒त्वे स॒जोषाः॑ । आ वृ॑त्र॒हेन्द्र॑श्चर्षणि॒प्रास्तु॒विष्ट॑मो न॒रां न॑ इ॒ह ग॑म्याः ॥ (६)
त्वष्टा देव हमारे सामने आवें और यज्ञ के कारण स्तोता और ऋत्विजों के प्रति प्रसन्न हों. वृत्रनाशक, यजमानों की इच्छा पूर्ण करने वाले एवं महान्‌ इंद्र हमारे इस यज्ञ में आवें. (६)
May the Taksha deva come before us and be pleased with the stotas and the ritvijas because of the yajna. The revolutionary, the one who fulfills the wishes of the hosts and the great Indra should come in this yagna of ours. (6)