ऋग्वेद (मंडल 1)
उ॒त न॑ ईं म॒रुतो॑ वृ॒द्धसे॑नाः॒ स्मद्रोद॑सी॒ सम॑नसः सदन्तु । पृष॑दश्वासो॒ऽवन॑यो॒ न रथा॑ रि॒शाद॑सो मित्र॒युजो॒ न दे॒वाः ॥ (८)
परम शक्तिशाली, हमारे समान ही प्रीतियुक्त, पृषत नामक घोड़ों वाले, नम्र एवं शत्रुनाशक मरुद्गण धरती और आकाश से हमारे पास इस प्रकार आवें, जिस प्रकार मित्रता करने वाले एक-दूसरे के समीप जाते हैं. (८)
The most powerful, the same loving as us, the horses named Prisht, the meek and the hostile deserts come to us from the earth and the sky in the same way that the befrienders approach each other. (8)