ऋग्वेद (मंडल 1)
तव॒ त्ये पि॑तो॒ रसा॒ रजां॒स्यनु॒ विष्ठि॑ताः । दि॒वि वाता॑ इव श्रि॒ताः ॥ (४)
हे पितः अर्थात् अन्न! जिस प्रकार आकाश में हवा व्याप्त है, उसी प्रकार तुम्हारा रस सारे संसार में फैला हुआ है. (४)
O pitam, that is, food! Just as the air pervades the sky, so your juice is spread all over the world. (4)