ऋग्वेद (मंडल 1)
पि॒तुं नु स्तो॑षं म॒हो ध॒र्माणं॒ तवि॑षीम् । यस्य॑ त्रि॒तो व्योज॑सा वृ॒त्रं विप॑र्वम॒र्दय॑त् ॥ (१)
मैं सबके धारणकर्ता एवं बलरूप पालक अन्न की शीघ्र स्तुति करता हूं. अन्न की शक्ति से इंद्र ने वृत्र असुर के टुकड़े कर दिए थे. (१)
I quickly praise the treasure and the strong foster food. Indra had cut the Vrithra asura into pieces with the power of food. (1)
ऋग्वेद (मंडल 1)
स्वादो॑ पितो॒ मधो॑ पितो व॒यं त्वा॑ ववृमहे । अ॒स्माक॑मवि॒ता भ॑व ॥ (२)
हे स्वादिष्ट एवं मधुर पितः! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमारे रक्षक बनो. (२)
O delicious and sweet drink! We praise you. You be our protector. (2)
ऋग्वेद (मंडल 1)
उप॑ नः पित॒वा च॑र शि॒वः शि॒वाभि॑रू॒तिभिः॑ । म॒यो॒भुर॑द्विषे॒ण्यः सखा॑ सु॒शेवो॒ अद्व॑याः ॥ (३)
हे मंगलरूप पितः! कल्याणकारी रक्षा साधनों के साथ हमारे पास आओ और हमें सुख दो. तुम हमारे लिए प्रिय रस वाले मित्र एवं अनोखे सुखदाता बनो. (३)
Oh, my godly pitho! Come to us with welfare protection means and give us happiness. Be a dear juice friend and a unique comforter to us. (3)
ऋग्वेद (मंडल 1)
तव॒ त्ये पि॑तो॒ रसा॒ रजां॒स्यनु॒ विष्ठि॑ताः । दि॒वि वाता॑ इव श्रि॒ताः ॥ (४)
हे पितः अर्थात् अन्न! जिस प्रकार आकाश में हवा व्याप्त है, उसी प्रकार तुम्हारा रस सारे संसार में फैला हुआ है. (४)
O pitam, that is, food! Just as the air pervades the sky, so your juice is spread all over the world. (4)
ऋग्वेद (मंडल 1)
तव॒ त्ये पि॑तो॒ दद॑त॒स्तव॑ स्वादिष्ठ॒ ते पि॑तो । प्र स्वा॒द्मानो॒ रसा॑नां तुवि॒ग्रीवा॑ इवेरते ॥ (५)
हे परम स्वादिष्ट पितः! तुम्हारी प्रार्थना करने वाले मनुष्य तुम्हारा भोग करते हैं. तुम्हारी कृपा से ही वे तुम्हारा दान करते हैं. तुम्हारे रस का भोग करने वाले मनुष्य गरदन ऊंची करके चलते हैं. (५)
Oh the most delicious pitha! The people who pray to you enjoy you. It is by your grace that they donate to you. The people who enjoy your juice walk with their necks high. (5)
ऋग्वेद (मंडल 1)
त्वे पि॑तो म॒हानां॑ दे॒वानां॒ मनो॑ हि॒तम् । अका॑रि॒ चारु॑ के॒तुना॒ तवाहि॒मव॑सावधीत् ॥ (६)
हे पितः! महान् देवों का मन तुम्हीं में लगा हुआ है. इंद्र ने तुम्हारी रक्षा एवं बुद्धि का सहारा लेकर ही वृत्र का वध किया था. (६)
Oh, my father! The mind of the great gods is in you. Indra killed Vrithra only by taking the help of your defense and wisdom. (6)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यद॒दो पि॑तो॒ अज॑गन्वि॒वस्व॒ पर्व॑तानाम् । अत्रा॑ चिन्नो मधो पि॒तोऽरं॑ भ॒क्षाय॑ गम्याः ॥ (७)
हे मधुर पितः! जब बादल प्रसिद्ध जल बरसाने को लावें, उस समय तुम पर्याप्त भोजन के रूप में हमारे समीप आना. (७)
Oh sweet pitho! When the clouds rain the famous water, you come close to us as enough food. (7)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यद॒पामोष॑धीनां परिं॒शमा॑रि॒शाम॑हे । वाता॑पे॒ पीव॒ इद्भ॑व ॥ (८)
हे शरीर! हम जौ आदि वनस्पतियों को पर्याप्त मात्रा में खाते हैं, इसलिए तुम मोटे बनो. (८)
O body! We eat enough of the barley etc. flora, so you become fat. (8)