ऋग्वेद (मंडल 1)
आ॒जुह्वा॑नो न॒ ईड्यो॑ दे॒वाँ आ व॑क्षि य॒ज्ञिया॑न् । अग्ने॑ सहस्र॒सा अ॑सि ॥ (३)
हे ईड्य अग्नि! हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम यज्ञ के योग्य देवों को यहाँ लाओ. तुम हजारों प्रकार का अन्न देते हो. (३)
O jealous fire! We call you. You bring here the deities worthy of yajna. You give thousands of types of food. (3)