ऋग्वेद (मंडल 1)
प्रा॒चीनं॑ ब॒र्हिरोज॑सा स॒हस्र॑वीरमस्तृणन् । यत्रा॑दित्या वि॒राज॑थ ॥ (४)
हजारों वीरों वाले एवं पूर्व की ओर मुंह किए हुए अग्निरूपी कुश पर आदित्य बैठते हैं. ऋत्विज् उसे मंत्रं द्वारा फैलाते हैं. (४)
Aditya sits on the fire-shaped Kush, thousands of heroes and facing east. The ritwiz spreads it through mantras. (4)