ऋग्वेद (मंडल 1)
इ॒दमा॑पः॒ प्र व॑हत॒ यत्किं च॑ दुरि॒तं मयि॑ । यद्वा॒हम॑भिदु॒द्रोह॒ यद्वा॑ शे॒प उ॒तानृ॑तम् ॥ (२२)
मेरे भीतर जो कुछ बुराइयां हैं, मैंने दूसरों के साथ जो द्रोह किया है, दूसरों को जो दुर्वचन कहे हैं या जो असत्य भाषण किया है, हे जल! उन सबको धो डालो. (२२)
Whatever evils are in me, the malice that I have done to others, the evils that I have spoken to others, or the untrue speech that I have made, O water! Wash them all off. (22)