हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 27
अश्वं॒ न त्वा॒ वार॑वन्तं व॒न्दध्या॑ अ॒ग्निं नमो॑भिः । स॒म्राज॑न्तमध्व॒राणा॑म् ॥ (१)
हे अग्नि देव! तुम यज्ञ के सम्राट्‌ एवं पूंछ वाले घोड़े के समान हो. हम स्तुतियों के द्वारा तुम्हारी वंदना करते है. (१)
O God of agni! You are like the emperor of yajna and the tail horse. We worship you through praises. (1)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 27
स घा॑ नः सू॒नुः शव॑सा पृ॒थुप्र॑गामा सु॒शेवः॑ । मी॒ढ्वाँ अ॒स्माकं॑ बभूयात् ॥ (२)
अग्नि शक्ति के पुत्र और शीघ्र गमन करने वाले हैं, वे हमारे ऊपर प्रसन्न होकर हमें सुख दें और हमारी अभिलाषाओं की वर्षा करें. (२)
The sons of the power of agni and the one who will soon go, may they be pleased with us, and give us happiness and shower our desires. (2)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 27
स नो॑ दू॒राच्चा॒साच्च॒ नि मर्त्या॑दघा॒योः । पा॒हि सद॒मिद्वि॒श्वायुः॑ ॥ (३)
हे अग्नि! तुम सर्वत्र गमन करने में समर्थ हो. तुम हमारा अनिष्ट करने वाले पापाचारी मनुष्यों से दूर एवं समीप देश में हमारी रक्षा करो. (३)
O agni! You are able to travel everywhere. Protect us in the land near and away from the papacy who do us evil. (3)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 27
इ॒ममू॒ षु त्वम॒स्माकं॑ स॒निं गा॑य॒त्रं नव्यां॑सम् । अग्ने॑ दे॒वेषु॒ प्र वो॑चः ॥ (४)
हे अग्नि! इस यज्ञ में उपस्थित हवि और नवीनतम गायत्री छंद में रचित स्तोत्र के विषय में देवों को बताना. (४)
O agni! To tell the devas about the hymns composed in the latest Gayatri verses and the havi present in this yajna. (4)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 27
आ नो॑ भज पर॒मेष्वा वाजे॑षु मध्य॒मेषु॑ । शिक्षा॒ वस्वो॒ अन्त॑मस्य ॥ (५)
हे अग्नि! हमें दिव्यलोक तथा अंतरिक्षलोक का अन्न सब ओर से प्राप्त कराओ. तुम हमें भूलोक संबंधी धन भी प्रदान करो. (५)
O agni! Give us the grain of the divine and the space world from all sides. You also provide us with forgetful funds. (5)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 27
वि॒भ॒क्तासि॑ चित्रभानो॒ सिन्धो॑रू॒र्मा उ॑पा॒क आ । स॒द्यो दा॒शुषे॑ क्षरसि ॥ (६)
हे विलक्षण प्रकाश वाले अग्नि देव! जिस प्रकार सिंधु की लहरें जल को सभी पर्वतों, नालियों आदि में भर देती हैं, उसी प्रकार तुम भी लोगों में धन का विभाग करने वाले हो. द्रव्य देने वाले यजमान को तुम कर्म का फल शीघ्र दो. (६)
O god of agni with a wonderful light! Just as the waves of the Indus fill the water in all the mountains, drains, etc., so you are also going to divide the wealth among the people. Give the host who gives the matter the fruit of the deed quickly. (6)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 27
यम॑ग्ने पृ॒त्सु मर्त्य॒मवा॒ वाजे॑षु॒ यं जु॒नाः । स यन्ता॒ शश्व॑ती॒रिषः॑ ॥ (७)
हे अग्नि देव! युद्भक्षेत्र में तुम जिस मनुष्य की रक्षा करते हो और तुम्हारी प्रेरणा से जो युद्भक्षेत्र में जाता है, वह नित्य ही अन्न प्राप्त करता रहेगा. (७)
O God of agni! The man you protect in the battlefield and the one who goes to the battlefield by your inspiration will continue to receive food forever. (7)

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 27
नकि॑रस्य सहन्त्य पर्ये॒ता कय॑स्य चित् । वाजो॑ अस्ति श्र॒वाय्यः॑ ॥ (८)
हे अग्नि देव! तुम शत्रुओं का दमन करने वाले हो. तुम्हारे भक्त यजमान पर कोई आक्रमण नहीं कर सकता, क्योंकि उसके पास विशेष प्रकार की शक्ति है. (८)
O God of agni! You are going to oppress the enemies. Your devotee cannot attack the host, because he has a special kind of power. (8)
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