हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.30.10

मंडल 1 → सूक्त 30 → श्लोक 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 30
तं त्वा॑ व॒यं वि॑श्ववा॒रा शा॑स्महे पुरुहूत । सखे॑ वसो जरि॒तृभ्यः॑ ॥ (१०)
हे सबके प्रिय इंद्र! अगणित लोग तुम्हें अपने यज्ञां में बुलाते हैं. तुम्हें सब मित्र के समान प्रेम करते हैं. तुम सबको स्वर्ग में स्थान देते हो. मैं प्रार्थना करता हूं कि तुम स्तुति करने वालों पर कृपा करो. (१०)
O beloved of all, Indra! Countless people call you to their sacrifices. All of you love you like friends. You place everyone in heaven. I pray that you may have mercy on those who praise you. (10)