हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.36.10

मंडल 1 → सूक्त 36 → श्लोक 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 36
यं त्वा॑ दे॒वासो॒ मन॑वे द॒धुरि॒ह यजि॑ष्ठं हव्यवाहन । यं कण्वो॒ मेध्या॑तिथिर्धन॒स्पृतं॒ यं वृषा॒ यमु॑पस्तु॒तः ॥ (१०)
हे हव्यवाहक अग्नि! समस्त देवों ने मनु के लिए इस यज्ञस्थल में तुझ परम पूज्य अग्नि को धारण किया था. कण्व ने पूज्य अतिथियों के साथ धन द्वारा प्रसन्न करने वाले तुझ अग्नि को धारण किया था. वर्षा करने वाले इंद्र एवं अन्य स्तुतिकर्त्ताओं ने भी तुम्हें धारण किया था. (१०)
O evil agni! All the gods had put on your supreme godly agni in this sacrificial place for Manu. Kanva wore the agni that pleased you with money with the revered guests. Indra and other eulogists who rained also held you. (10)