ऋग्वेद (मंडल 1)
घ॒नेव॒ विष्व॒ग्वि ज॒ह्यरा॑व्ण॒स्तपु॑र्जम्भ॒ यो अ॑स्म॒ध्रुक् । यो मर्त्यः॒ शिशी॑ते॒ अत्य॒क्तुभि॒र्मा नः॒ स रि॒पुरी॑शत ॥ (१६)
हे उष्ण किरणों वाले अग्नि! हम लोग जिस प्रकार डंडे, पत्थर आदि से मिट्टी का बर्तन फोड़ते हैं, तुम उसी प्रकार धन दान न करने वाले, हमसे द्वेष रखने वाले एवं हमें डराने- धमकाने वाले तथा शस्त्रप्रहार करने वाले शत्रु का सब प्रकार से संहार करो. (१६)
O agni with hot rays! Just as we break the earthen pot with sticks, stones, etc., you must destroy in all respects the enemy who does not donate money, who hates us and threatens us. (16)