ऋग्वेद (मंडल 1)
प्र यदि॒त्था प॑रा॒वतः॑ शो॒चिर्न मान॒मस्य॑थ । कस्य॒ क्रत्वा॑ मरुतः॒ कस्य॒ वर्प॑सा॒ कं या॑थ॒ कं ह॑ धूतयः ॥ (१)
हे कंपनकारी मरुद्गणो! जिस प्रकार सूर्य आकाश से अपनी तेज रोशनी धरती पर फेंकता है, उसी प्रकार जब तुम दूर आकाश से अपनी शक्ति धरती पर डालते हो तो तुम किस यज्ञ में किस यजमान द्वारा आकर्षित किए जाते हो तथा किस यजमान के समीप जाते हो? (१)
O vibrating deserts! Just as the sun throws its bright light from the sky to the earth, so when you pour your power from the distant sky onto the earth, in which yagna are you attracted by which host and near to which host do you go? (1)
ऋग्वेद (मंडल 1)
स्थि॒रा वः॑ स॒न्त्वायु॑धा परा॒णुदे॑ वी॒ळू उ॒त प्र॑ति॒ष्कभे॑ । यु॒ष्माक॑मस्तु॒ तवि॑षी॒ पनी॑यसी॒ मा मर्त्य॑स्य मा॒यिनः॑ ॥ (२)
हे मरुदगणो! तुम्हारे आयुध शत्रु विनाश के लिए स्थिर और शत्रुओं को रोकने के लिए दृढ़ हों. तुम्हारी शक्ति स्तुति करने योग्य हो, हमारे प्रति धोखा करने वाले शत्रुओं की शक्ति प्रशंसनीय न हो. (२)
O the deserters! Let your armed enemies be firm to destruction and to stop the enemies. May your power be praiseworthy, let the power of enemies who betray us not be praiseworthy. (2)
ऋग्वेद (मंडल 1)
परा॑ ह॒ यत्स्थि॒रं ह॒थ नरो॑ व॒र्तय॑था गु॒रु । वि या॑थन व॒निनः॑ पृथि॒व्या व्याशाः॒ पर्व॑तानाम् ॥ (३)
हे नेताओ! जब तुम वृक्षादि स्थिर वस्तु को तोड़े हुए एवं पत्थर आदि भारी वस्तुओं को हिलाते हुए चलते ही, तब पृथ्वी पर खड़े वनों के बीच से तथा पर्वतों के बगल वाले मार्ग से चलते हो. (३)
Hey leaders! When you walk as you break the still object of the tree and shake the heavy objects like stones, etc., you walk between the forests standing on the earth and the path next to the mountains. (3)
ऋग्वेद (मंडल 1)
न॒हि वः॒ शत्रु॑र्विवि॒दे अधि॒ द्यवि॒ न भूम्यां॑ रिशादसः । यु॒ष्माक॑मस्तु॒ तवि॑षी॒ तना॑ यु॒जा रुद्रा॑सो॒ नू चि॑दा॒धृषे॑ ॥ (४)
हे शत्रुनाशकारी! धरती और आकाश में तुम्हारा कोई शत्रु नहीं हुआ. हे रुद्रपुत्रो! तुम सबकी सम्मिलित शक्ति शत्रुओं का दमन करने के लिए विस्तृत हो. (४)
O enemy! You have no enemies on earth and in the sky. O rudraputras! All of you have the combined power to oppress enemies. (4)
ऋग्वेद (मंडल 1)
प्र वे॑पयन्ति॒ पर्व॑ता॒न्वि वि॑ञ्चन्ति॒ वन॒स्पती॑न् । प्रो आ॑रत मरुतो दु॒र्मदा॑ इव॒ देवा॑सः॒ सर्व॑या वि॒शा ॥ (५)
मरुद्गण पर्वतों को भली प्रकार कंपित करते एवं वृक्षों को एक-दूसरे से अलग करते हैं हे देवो! जिस प्रकार मतवाले लोग स्वेच्छा से सब जगह जाते हैं. उसी प्रकार तुम भी प्रजाओं के साथ सर्वत्र जाते हो. (५)
The deserts vibrate the mountains well and separate the trees from one another, O Gods! Just as people with votes go everywhere voluntarily. In the same way you also go everywhere with the people. (5)
ऋग्वेद (मंडल 1)
उपो॒ रथे॑षु॒ पृष॑तीरयुग्ध्वं॒ प्रष्टि॑र्वहति॒ रोहि॑तः । आ वो॒ यामा॑य पृथि॒वी चि॑दश्रो॒दबी॑भयन्त॒ मानु॑षाः ॥ (६)
तुम बुंदकियों वाले हरिणों को अपने रथ में जोतते हो. लाल हरिण तुम्हारे रथ के जुए को खींचता है. तुम्हारे आने की ध्वनि धरती और आकाश ने सुनी है तथा मनुष्य भयभीत हो उठे हैं. (६)
You plough the deer of the bunks in your chariot. The red deer pulls the yoke of your chariot. The earth and the sky have heard the sound of your coming, and men are afraid. (6)
ऋग्वेद (मंडल 1)
आ वो॑ म॒क्षू तना॑य॒ कं रुद्रा॒ अवो॑ वृणीमहे । गन्ता॑ नू॒नं नोऽव॑सा॒ यथा॑ पु॒रेत्था कण्वा॑य बि॒भ्युषे॑ ॥ (७)
हे रुद्रपुत्रो! हम पुत्र-प्राप्ति के लिए तुम्हारी रक्षणशक्ति की शीघ्र प्रार्थना करते हैं. पहले किए गए यज्ञों में हमारी रक्षा के लिए तुम जिस प्रकार आए थे, उसी प्रकार भयभीत एवं बुद्धिमान् यजमान की रक्षा के लिए उनके समीप आओ. (७)
O rudraputras! We pray for your protective power to have a son soon. Just as you came to protect us in the yajnas performed earlier, come close to them to protect the fearful and wise. (7)
ऋग्वेद (मंडल 1)
यु॒ष्मेषि॑तो मरुतो॒ मर्त्ये॑षित॒ आ यो नो॒ अभ्व॒ ईष॑ते । वि तं यु॑योत॒ शव॑सा॒ व्योज॑सा॒ वि यु॒ष्माका॑भिरू॒तिभिः॑ ॥ (८)
हे मरुद्गणो! तुम्हारी अथवा किसी अन्य पुरुष की प्रेरणा से जो भी शत्रु हमारे सामने आवे, तुम उसका बल और अन्न छीन लो और उससे अपनी रक्षा भी वापस कर लो. (८)
O deserters! Whatever enemy comes before us by the inspiration of you or any other man, take away his strength and food and return your protection from him. (8)