ऋग्वेद (मंडल 1)
प्र वे॑पयन्ति॒ पर्व॑ता॒न्वि वि॑ञ्चन्ति॒ वन॒स्पती॑न् । प्रो आ॑रत मरुतो दु॒र्मदा॑ इव॒ देवा॑सः॒ सर्व॑या वि॒शा ॥ (५)
मरुद्गण पर्वतों को भली प्रकार कंपित करते एवं वृक्षों को एक-दूसरे से अलग करते हैं हे देवो! जिस प्रकार मतवाले लोग स्वेच्छा से सब जगह जाते हैं. उसी प्रकार तुम भी प्रजाओं के साथ सर्वत्र जाते हो. (५)
The deserts vibrate the mountains well and separate the trees from one another, O Gods! Just as people with votes go everywhere voluntarily. In the same way you also go everywhere with the people. (5)