हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.41.2

मंडल 1 → सूक्त 41 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 41
यं बा॒हुते॑व॒ पिप्र॑ति॒ पान्ति॒ मर्त्यं॑ रि॒षः । अरि॑ष्टः॒ सर्व॑ एधते ॥ (२)
वरुणादि देव जिस यजमान को अपने हाथ से धनसंपन्न करते एवं हिंसकों से बचाते हैं, वह सबसे सुरक्षित रहकर उन्नति करता है. (२)
The host whom Varunadi Dev makes money with his own hands and protects from the violent, he prospers by staying safe. (2)