हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.44.11

मंडल 1 → सूक्त 44 → श्लोक 11 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 44
नि त्वा॑ य॒ज्ञस्य॒ साध॑न॒मग्ने॒ होता॑रमृ॒त्विज॑म् । म॒नु॒ष्वद्दे॑व धीमहि॒ प्रचे॑तसं जी॒रं दू॒तमम॑र्त्यम् ॥ (११)
हे अग्नि! तुम यज्ञ के साधन, देवताओं का आह्वान करने वाले, ऋत्विज्‌, उत्तम ज्ञानसंपन्न, शत्रुओं की आयु नष्ट करने वाले, देवदूत तथा मरणरहित हो. हम मनु के समान तुम्हें यज्ञ में स्थापित करते है. (११)
O agni! You are the means of yajna, the one who invokes the gods, the debtors, the best of knowledge, the destroyers of the ages of enemies, the angels and the ones without death. We install you in the yagna like Manu. (11)