ऋग्वेद (मंडल 1)
या द॒स्रा सिन्धु॑मातरा मनो॒तरा॑ रयी॒णाम् । धि॒या दे॒वा व॑सु॒विदा॑ ॥ (२)
मैं दर्शनीय एवं समुद्रपुत्र अश्विनीकुमारों की स्तुति करता हूं. वे शोभन संपत्ति देते हैं और यज्ञ करने पर हमें निवासस्थान प्रदान करते हैं. (२)
I praise the sighted and sea-son Ashwinikumars. They give shobhan property and give us residence when we perform yajna. (2)