ऋग्वेद (मंडल 1)
येना॑ पावक॒ चक्ष॑सा भुर॒ण्यन्तं॒ जना॒ँ अनु॑ । त्वं व॑रुण॒ पश्य॑सि ॥ (६)
हे सूर्य! तुम सबके शोधक एवं अनिष्टनिवारक हो. तुम जिस प्रकार प्रकाश के द्वारा प्राणियों का भरणपोषण करते हुए इस जगत् को देखते हो, हम उसी प्रकाश की स्तुति करते हैं. (६)
O sun! You are all seekers and evil-doers. Just as you see this world nourishing beings through light, we praise the same light. (6)