हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.51.12

मंडल 1 → सूक्त 51 → श्लोक 12 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 51
आ स्मा॒ रथं॑ वृष॒पाणे॑षु तिष्ठसि शार्या॒तस्य॒ प्रभृ॑ता॒ येषु॒ मन्द॑से । इन्द्र॒ यथा॑ सु॒तसो॑मेषु चा॒कनो॑ऽन॒र्वाणं॒ श्लोक॒मा रो॑हसे दि॒वि ॥ (१२)
हे इंद्र! तुम सोमरस पीने के लिए रथ पर बैठकर गमन करते हो. जिस सोम से तुम प्रसन्न होते हो, वही सोम शार्यात राजर्षि ने तैयार किया है. तुम जिस प्रकार अन्य यज्ञों में निचोड़े हुए सोमरस को पीते हो, उसी प्रकार इस शार्यात के सोम की भी कामना करो. ऐसा करने से तुम स्वर्ग में स्थिर यश प्राप्त करोगे. (१२)
O Indra! You sit on the chariot to drink somers and walk. The same Som with which you are pleased, the same Som has been prepared by Shariat Rajarshi. Just as you drink the squeezed somras in other yagnas, so also wish for the som of this shariaat. By doing so, you will gain steady glory in heaven. (12)