हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.61.10

मंडल 1 → सूक्त 61 → श्लोक 10 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 61
अ॒स्येदे॒व शव॑सा शु॒षन्तं॒ वि वृ॑श्च॒द्वज्रे॑ण वृ॒त्रमिन्द्रः॑ । गा न व्रा॒णा अ॒वनी॑रमुञ्चद॒भि श्रवो॑ दा॒वने॒ सचे॑ताः ॥ (१०)
इंद्र ने अपनी ही शक्ति से जल रोकने वाले वृत्र का उच्छेद कर दिया था. जिस प्रकार चोरों द्वारा रोकी हुई गाएं इंद्र ने छुड़वा दी थीं, उसी प्रकार वूत्र द्वारा रोका हुआ विश्व का रक्षक जल छुड़वा दिया था. इंद्र हव्य देने वाले को इच्छानुसार अन्न देते हैं. (१०)
Indra had removed the water-stopping circle with his own power. Just as indra had released the cows stopped by the thieves, so the world's protector water stopped by the potter was released. Indra gives food to the giver of the havya as per his will. (10)