ऋग्वेद (मंडल 1)
पिन्व॑न्त्य॒पो म॒रुतः॑ सु॒दान॑वः॒ पयो॑ घृ॒तव॑द्वि॒दथे॑ष्वा॒भुवः॑ । अत्यं॒ न मि॒हे वि न॑यन्ति वा॒जिन॒मुत्सं॑ दुहन्ति स्त॒नय॑न्त॒मक्षि॑तम् ॥ (६)
ऋत्विज् जिस प्रकार घी से यज्ञभूमि को सींचते हैं, वैसे ही शोभन गति वाले मरुत् सारयुक्त जल से सारी धरती को सींचते हैं, क्योंकि घुड़सवार जिस प्रकार घोड़े को सिखाता है, उसी प्रकार वे वेगशाली मेघों को वर्षा के निमित्त अपने वश में कर लेते हैं एवं झुके हुए बादल को जलरहित बना देते हैं. (६)
Just as the ritwij irrigates the sacrificial land with ghee, they irrigate the whole earth with desert water with a gentle motion, because just as the horseman teaches the horse, in the same way they subdue the fast clouds for the sake of rain and make the inclined cloud waterless. (6)