ऋग्वेद (मंडल 1)
ऋषि॒र्न स्तुभ्वा॑ वि॒क्षु प्र॑श॒स्तो वा॒जी न प्री॒तो वयो॑ दधाति ॥ (४)
रमणीय घर के समान स्तोताओं को दिए हुए धन की रक्षा में समर्थ, पके हुए जौ के समान सबके उपभोग योग्य, मंत्रद्रष्टा ऋषियों के समान देवों के स्तुतिकर्ता, यजमानों में प्रसिद्ध एवं अश्व के समान हर्षयुक्त अग्नि हमें अन्न दें. (४)
Like a beautiful house, able to protect the wealth given to the worshipers, like ripe barley, usable by all, praising the gods like the sages who see the mantra, like a famous host and like a horse, Agni give us the grain. (4)