हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.69.5

मंडल 1 → सूक्त 69 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 69
पु॒त्रो न जा॒तो र॒ण्वो दु॑रो॒णे वा॒जी न प्री॒तो विशो॒ वि ता॑रीत् ॥ (५)
यज्ञगृह में उत्पन्न होकर अग्नि पुत्र के समान आनंदकारी एवं प्रसन्न होकर संग्राम में अश्व के समान शत्रुओं को भगाने वाले है. जब मैं ऋषियों के साथ मिलकर एकत्र निवास करने वाले देवों को बुलाता हूं तो यह अग्नि स्वयं ही उन देवताओं का रूप बना लेते हैं. (५)
Being born in the yagyagriha, Agni is joyful and happy like a son, who is going to drive away enemies in battle like a horse. When I call upon the gods who reside together with the sages, then this agni itself takes the form of those gods. (5)