हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.72.3

मंडल 1 → सूक्त 72 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 72
ति॒स्रो यद॑ग्ने श॒रद॒स्त्वामिच्छुचिं॑ घृ॒तेन॒ शुच॑यः सप॒र्यान् । नामा॑नि चिद्दधिरे य॒ज्ञिया॒न्यसू॑दयन्त त॒न्व१॒ः॑ सुजा॑ताः ॥ (३)
हे शुद्ध अग्नि! दीप्तिसंपन्न मरुतों ने तीन वर्ष तक घृत से तुम्हारी पूजा की, तब तुम प्रकट हुए. तभी तुम्हारी अनुकंपा से उन्होंने यज्ञ में प्रयोग करने योग्य नाम एवं शरीर प्राप्त किए. (३)
O pure agni! The bright maruts worshiped you for three years, and you appeared. It was only then that with your compassion, they got names and bodies to be used in the yajna. (3)