ऋग्वेद (मंडल 1)
आ रोद॑सी बृह॒ती वेवि॑दानाः॒ प्र रु॒द्रिया॑ जभ्रिरे य॒ज्ञिया॑सः । वि॒दन्मर्तो॑ ने॒मधि॑ता चिकि॒त्वान॒ग्निं प॒दे प॑र॒मे त॑स्थि॒वांस॑म् ॥ (४)
यज्ञपात्र देवों ने विस्तृत आकाश एवं धरती के बीच रहकर अग्नि के योग्य स्तुतियां की थीं. मरुदगणों ने इंद्र के साथ जाना कि अग्नि उत्तम स्थान में छिपे हैं. इसके पश्चात् उन्हें प्राप्त किया. (४)
The sacrificial gods had made praises worthy of agni by living amidst the vast sky and the earth. The deserters learned with Indra that the agnis are hidden in the best place. Then received them. (4)