ऋग्वेद (मंडल 1)
दे॒वो न यः स॑वि॒ता स॒त्यम॑न्मा॒ क्रत्वा॑ नि॒पाति॑ वृ॒जना॑नि॒ विश्वा॑ । पु॒रु॒प्र॒श॒स्तो अ॒मति॒र्न स॒त्य आ॒त्मेव॒ शेवो॑ दिधि॒षाय्यो॑ भूत् ॥ (२)
जो अग्नि प्रकाश युक्त सूर्य के समान यथार्थदर्शी होकर अपने कर्मो से लोगों को सब दुःखों से बचाते हैं, यजमानों से प्रशंसित होकर रूप के समान परिवर्तनहीन एवं आत्मा के समान सुखदायक हैं, ऐसे अग्नि को सब यजमान धारण करते हैं. (२)
Those who are as realistic as the light sun and protect people from all sufferings by their deeds, are admired by the hosts and are as changeless as form and soothing as soul, such agni is considered by all hosts. (2)