हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.77.5

मंडल 1 → सूक्त 77 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 77
ए॒वाग्निर्गोत॑मेभिरृ॒तावा॒ विप्रे॑भिरस्तोष्ट जा॒तवे॑दाः । स ए॑षु द्यु॒म्नं पी॑पय॒त्स वाजं॒ स पु॒ष्टिं या॑ति॒ जोष॒मा चि॑कि॒त्वान् ॥ (५)
यज्ञ के स्वामी एवं सर्वज्ञाता अग्नि की गौतम आदि ऋषियों ने इसी प्रकार स्तुति की थी. अन्ने ने प्रसन्न होकर उन ऋषियों का तेजस्वी सोम पिया था एवं अन्न भक्षण किया था. वे अग्नि हमारे द्वारा दिए हव्य को जानकर पुष्ट होते हैं. (५)
The lord of the yajna and the omniscient agni was similarly praised by gautama etc. sages. Anne was pleased to have drunk the bright som of those sages and ate food. Those agnis are confirmed by knowing the details we have given. (5)