हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.80.2

मंडल 1 → सूक्त 80 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 80
स त्वा॑मद॒द्वृषा॒ मदः॒ सोमः॑ श्ये॒नाभृ॑तः सु॒तः । येना॑ वृ॒त्रं निर॒द्भ्यो ज॒घन्थ॑ वज्रि॒न्नोज॒सार्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥ (२)
हे इंद्र! गीले करने वाले मादक श्येन पक्षी का रूप धारण करने वाली गायत्री द्वारा लाए गए एवं निचोड़े हुए सोमरस ने तुम्हें प्रसन्न किया था. हे वज्री! तुमने अपना अधिकार प्रकट करते हुए अपनी शक्ति से आकाश में वृत्र राक्षस को मारा था. (२)
O Indra! The somras brought and squeezed by Gayatri, who took the form of a wet intoxicating sheen bird, pleased you. O Vajri! You had killed the vrikra monster in the sky with your power while expressing your authority. (2)