हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.80.3

मंडल 1 → सूक्त 80 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 80
प्रेह्य॒भी॑हि धृष्णु॒हि न ते॒ वज्रो॒ नि यं॑सते । इन्द्र॑ नृ॒म्णं हि ते॒ शवो॒ हनो॑ वृ॒त्रं जया॑ अ॒पोऽर्च॒न्ननु॑ स्व॒राज्य॑म् ॥ (३)
हे इंद्र! जाओ और शत्रुओं के सामने पहुंचकर उन्हें हराओ कोई भी न तो तुम्हारे वज्र का नियमन कर सकता है और न तुम्हारी शक्ति को अभिभूत करने में समर्थ है, इसलिए तुम वृत्र राक्षस का वध करके उसके द्वारा रोके हुए जल को प्राप्त करो एवं अपने प्रभुत्व का प्रदर्शन करो. (३)
O Indra! Go and reach out to the enemies and defeat them, no one can regulate your thunderbolt nor is he able to overwhelm your power, so you must kill the demon Vritra and get the water held by him and demonstrate your dominion. (3)