हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.84.2

मंडल 1 → सूक्त 84 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 84
इन्द्र॒मिद्धरी॑ वह॒तोऽप्र॑तिधृष्टशवसम् । ऋषी॑णां च स्तु॒तीरुप॑ य॒ज्ञं च॒ मानु॑षाणाम् ॥ (२)
हरि नामक दोनों घोड़े अप्रधर्षित बल वाले इंद्र को वसिष्ठ आदि ऋषियों तथा अन्य मनुष्यों की स्तुति एवं यज्ञ के समीप पहुंचावें. (२)
Let both the horses, named Hari, bring Indra, with an unpulsive force, close to the praise and yagna of vasishta adi rishis and other human beings. (2)