ऋग्वेद (मंडल 1)
वि ये भ्राज॑न्ते॒ सुम॑खास ऋ॒ष्टिभिः॑ प्रच्या॒वय॑न्तो॒ अच्यु॑ता चि॒दोज॑सा । म॒नो॒जुवो॒ यन्म॑रुतो॒ रथे॒ष्वा वृष॑व्रातासः॒ पृष॑ती॒रयु॑ग्ध्वम् ॥ (४)
शोभन यज्ञ मरुद्गण आयुधों के कारण विशेष रूप से दीप्त होते हैं. वे स्वयं अच्युत रहकर दृढ़ पर्वत आदि को अपनी शक्ति द्वारा चंचल करते हैं. हे मरुद्गण! तुम जब अपने रथ में बुंदकियों वाली हरिणियों को जोड़ते हो, उस समय मन के समान गतिशील एवं वर्षा करने में समर्थ हो जाते हो. (४)
Shobhan Yajna Marudgana are especially bright due to the ordnance. They themselves keep achyuta and make the strong mountains, etc., fickle with their power. O deserters! When you add deer with bundlings to your chariot, you are able to move and rain like the mind. (4)