ऋग्वेद (मंडल 1)
श्रि॒यसे॒ कं भा॒नुभिः॒ सं मि॑मिक्षिरे॒ ते र॒श्मिभि॒स्त ऋक्व॑भिः सुखा॒दयः॑ । ते वाशी॑मन्त इ॒ष्मिणो॒ अभी॑रवो वि॒द्रे प्रि॒यस्य॒ मारु॑तस्य॒ धाम्नः॑ ॥ (६)
मरुद्गण चमकती हुई सूर्य की किरणों के साथ वह जल बरसाना चाहते हैं, जिसकी प्राणियों को आवश्यकता है वे स्तोताओं और ऋत्विजों के साथ हव्य भक्षण करते हैं. शोभन स्तुतिवचन से युक्त, गतिशील एवं भयरहित मरुद्गणों ने विशिष्ट स्थान प्राप्त किए हैं. (६)
Deserts want to rain water with the rays of the shining sun, which the creatures need, they eat havya with hymns and hymns. The dynamic and fearless deserts with the expression of adornment have taken special places. (6)