ऋग्वेद (मंडल 1)
प्रत्व॑क्षसः॒ प्रत॑वसो विर॒प्शिनोऽना॑नता॒ अवि॑थुरा ऋजी॒षिणः॑ । जुष्ट॑तमासो॒ नृत॑मासो अ॒ञ्जिभि॒र्व्या॑नज्रे॒ के चि॑दु॒स्रा इ॑व॒ स्तृभिः॑ ॥ (१)
शत्रुनाश में अति कुशल, प्रकृष्ट बलयुक्त, विविध जयघोषों से युक्त सर्वोत्कृष्ट, संघीभूत, यज्ञकर्ताओं द्वारा अतिशय सेवित, अवशिष्ट सोमरस का सेवन करने वाले, मेघ आदि के नेता मरुद्गण अपने शरीर पर धारण किए आभूषणों से आकाश में सूर्यकिरणों के समान चमकते हैं. (१)
In the enemy, the most skilled, the strongest, the supreme with various chants, the sanghibhuta, the over-served by the yagyakars, the ones who consume residual somras, the leader of the cloud, etc., the deserts, with ornaments worn on their bodies, shine like sun rays in the sky. (1)
ऋग्वेद (मंडल 1)
उ॒प॒ह्व॒रेषु॒ यदचि॑ध्वं य॒यिं वय॑ इव मरुतः॒ केन॑ चित्प॒था । श्चोत॑न्ति॒ कोशा॒ उप॑ वो॒ रथे॒ष्वा घृ॒तमु॑क्षता॒ मधु॑वर्ण॒मर्च॑ते ॥ (२)
हे मरुदगणो! जिस प्रकार पक्षी आकाशमार्ग से शीघ्र चलते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे समीपवर्ती आकाश में जब चलते हुए बादलों को एकत्र करते हो तो मेघ तुम्हारे रथों से लिपटकर पानी बरसाने लगते हैं. इसी हेतु तुम अपनी पूजा करने वाले यजमानों पर मधु के समान स्वच्छ जल बरसाओ. (२)
O the deserters! Just as the birds walk quickly through the sky, so when you gather the clouds in the sky near us, the clouds cling to your chariots and start raining water. For this reason, you should rain clean water like honey on the hosts who worship you. (2)
ऋग्वेद (मंडल 1)
प्रैषा॒मज्मे॑षु विथु॒रेव॑ रेजते॒ भूमि॒र्यामे॑षु॒ यद्ध॑ यु॒ञ्जते॑ शु॒भे । ते क्री॒ळयो॒ धुन॑यो॒ भ्राज॑दृष्टयः स्व॒यं म॑हि॒त्वं प॑नयन्त॒ धूत॑यः ॥ (३)
जिस समय मरुद्गण शोभन जल की वर्षा के लिए बादलों को तैयार करते हैं, उस समय उठे हुए बादलों को देखकर धरती उसी प्रकार कांप उठती है, जिस प्रकार पतिविहीना नारी राजा आदि के उपद्रवों को देखकर कांपती है. इस प्रकार विहारशील, चंचल स्वभाव एवं चमकीले आयुधों वाले मरुद्गण पर्वत आदि को कंपित करके अपना महत्त्व प्रकट करते हैं. (३)
At the time when the deserts prepare the clouds for the rain of shobhan water, the earth trembles at the same time as the husbandless woman trembles at the sight of the disturbances of the king, etc. Thus, the deserts with a wandering, playful nature and bright arms, express their importance by vibrating the mountains, etc. (3)
ऋग्वेद (मंडल 1)
स हि स्व॒सृत्पृष॑दश्वो॒ युवा॑ ग॒णो॒३॒॑ऽया ई॑शा॒नस्तवि॑षीभि॒रावृ॑तः । असि॑ स॒त्य ऋ॑ण॒यावाने॑द्यो॒ऽस्या धि॒यः प्रा॑वि॒ताथा॒ वृषा॑ ग॒णः ॥ (४)
स्वयं प्रेरित, सफेद बुंदकियों युक्त हरिणियों वाले, नित्य तरुण, असाधारण शक्तिसंपन्न, सत्यकर्मा, स्तोताओं को ऋणमुक्त करने वाले, अनिंदित एवं जलवर्षक मरुद्गण हमारे यज्ञ की रक्षा करते हैं. (४)
Self-inspired, white-bunked deer, the eternal youth, the extraordinary powerful, the Satyakarma, the debt-freer to the stothas, the unincorporated and water-year-olds protect our yajna. (4)
ऋग्वेद (मंडल 1)
पि॒तुः प्र॒त्नस्य॒ जन्म॑ना वदामसि॒ सोम॑स्य जि॒ह्वा प्र जि॑गाति॒ चक्ष॑सा । यदी॒मिन्द्रं॒ शम्यृक्वा॑ण॒ आश॒तादिन्नामा॑नि य॒ज्ञिया॑नि दधिरे ॥ (५)
हम अपने पिता रहूगण द्वारा बताई हुई बात कहते हैं कि सोमरस की आहुति के साथ की गई स्तुति मरुतों को प्राप्त होती है. इंद्र द्वारा संपन्न वृत्रवध के समय मरुद्गण उपस्थित थे और इंद्र की स्तुति कर रहे थे. इस प्रकार उन्होंने “यज्ञपात्र' नाम धारण किया. (५)
We say what our father, Rahugan, said that the praise given to the sacrifice of Somras is received by the maruts. At the time of the vrithravada concluded by Indra, the marudganas were present and praising Indra. Thus he assumed the name "Yajnapatra". (5)
ऋग्वेद (मंडल 1)
श्रि॒यसे॒ कं भा॒नुभिः॒ सं मि॑मिक्षिरे॒ ते र॒श्मिभि॒स्त ऋक्व॑भिः सुखा॒दयः॑ । ते वाशी॑मन्त इ॒ष्मिणो॒ अभी॑रवो वि॒द्रे प्रि॒यस्य॒ मारु॑तस्य॒ धाम्नः॑ ॥ (६)
मरुद्गण चमकती हुई सूर्य की किरणों के साथ वह जल बरसाना चाहते हैं, जिसकी प्राणियों को आवश्यकता है वे स्तोताओं और ऋत्विजों के साथ हव्य भक्षण करते हैं. शोभन स्तुतिवचन से युक्त, गतिशील एवं भयरहित मरुद्गणों ने विशिष्ट स्थान प्राप्त किए हैं. (६)
Deserts want to rain water with the rays of the shining sun, which the creatures need, they eat havya with hymns and hymns. The dynamic and fearless deserts with the expression of adornment have taken special places. (6)