हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 1.95.6

मंडल 1 → सूक्त 95 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 1)

ऋग्वेद: | सूक्त: 95
उ॒भे भ॒द्रे जो॑षयेते॒ न मेने॒ गावो॒ न वा॒श्रा उप॑ तस्थु॒रेवैः॑ । स दक्षा॑णां॒ दक्ष॑पतिर्बभूवा॒ञ्जन्ति॒ यं द॑क्षिण॒तो ह॒विर्भिः॑ ॥ (६)
रात और दिन दोनों शोभन स्त्रियों के समान अग्नि की सेवा करते एवं रंभाती हुई गायों के समान पास में आकर ठहरते हैं. आह्वानीय अग्नि के दक्षिण भाग में स्थित होकर ऋत्विज्‌ हव्य द्वारा जिस अग्नि को तृप्त करते हैं, वह समस्त बलों का स्वामी बनता है. (६)
Both night and day, shobhan serves the agni like women and comes and stays nearby like a roaring cows. The agni which is satiated by Rituzhavya, which is located in the southern part of the invoicing agni, becomes the master of all forces. (6)