ऋग्वेद (मंडल 1)
त्वे॒षं रू॒पं कृ॑णुत॒ उत्त॑रं॒ यत्स॑म्पृञ्चा॒नः सद॑ने॒ गोभि॑र॒द्भिः । क॒विर्बु॒ध्नं परि॑ मर्मृज्यते॒ धीः सा दे॒वता॑ता॒ समि॑तिर्बभूव ॥ (८)
जब अग्नि अंतरिक्ष में चलने वाले जलों से संयुक्त, तेजस्वी एवं सर्वोत्तम प्रकाश धारण करते हैं, तब क्रांतदर्शी एवं सर्वाधार अग्नि समस्त जल के मूलभूत आकाश को अपने तेज के द्वारा ढक लेते हैं. तेजस्वी अग्ने द्वारा फैलाई हुई चमक तेजसमूह बन गई थी. (८)
When agnis hold the combined, brightest and best light from the waters that move in space, the revolutionary and all-round agnis cover the basic sky of all the water with its brightness. The brightness spread by the stunning agne had become a bright group. (8)