ऋग्वेद (मंडल 10)
उ॒द्नो ह्र॒दम॑पिब॒ज्जर्हृ॑षाणः॒ कूटं॑ स्म तृं॒हद॒भिमा॑तिमेति । प्र मु॒ष्कभा॑रः॒ श्रव॑ इ॒च्छमा॑नोऽजि॒रं बा॒हू अ॑भर॒त्सिषा॑सन् ॥ (४)
इस बैल ने अत्यंत प्रसन्न होकर जल पिया है. यह अपने सींगों से मिट्टी के ढेर को खोदता हुआ शत्रु की ओर जाता है. लटकते हुए भारी अंडकोशों वाला यह बैल अन्न की इच्छा करता हुआ गमनशील शत्रु की बांहों पर प्रहार करता है. (४)
This bull has drunk the water very happily. It digs a pile of mud with its horns and leads to the enemy. This bull with hanging heavy scrotums strikes the arms of the moving enemy, desiring food. (4)