हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.110.4

मंडल 10 → सूक्त 110 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 110
प्रा॒चीनं॑ ब॒र्हिः प्र॒दिशा॑ पृथि॒व्या वस्तो॑र॒स्या वृ॑ज्यते॒ अग्रे॒ अह्ना॑म् । व्यु॑ प्रथते वित॒रं वरी॑यो दे॒वेभ्यो॒ अदि॑तये स्यो॒नम् ॥ (४)
प्रातः वेदी को आच्छादित करने के लिए कुशों को पूर्व की ओर मुख करके बिछाया जाता है. यह सुंदर कुश अधिक फैलाया जाता है. यह अदिति तथा अन्य देवों के बैठने के लिए है. (४)
In the morning, kushas are laid facing east to cover the altar. This beautiful kush is more spread out. It is for Aditi and other gods to sit. (4)