हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 110
समि॑द्धो अ॒द्य मनु॑षो दुरो॒णे दे॒वो दे॒वान्य॑जसि जातवेदः । आ च॒ वह॑ मित्रमहश्चिकि॒त्वान्त्वं दू॒तः क॒विर॑सि॒ प्रचे॑ताः ॥ (१)
हे जातवेद अग्नि! तुम आज मानवों के घर में प्रज्वलित होकर इंद्रादि देवों की पूजा करते हो. स्तोता मित्रों की पूजा करने वाले अग्नि! तुम स्तोताओं द्वारा की हुई स्तुतियां जानते हुए देवों को बुलाओ. तुम बुद्धिमान्‌ एवं कार्यकुशल हो. (१)
O Jativeda Agni! Today you are ignited in the house of human beings and worship the Indradi devas. Fire to worship the stota friends! You call the gods knowing the praises made by the Psalms. You are intelligent and efficient. (1)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 110
तनू॑नपात्प॒थ ऋ॒तस्य॒ याना॒न्मध्वा॑ सम॒ञ्जन्स्व॑दया सुजिह्व । मन्मा॑नि धी॒भिरु॒त य॒ज्ञमृ॒न्धन्दे॑व॒त्रा च॑ कृणुह्यध्व॒रं नः॑ ॥ (२)
हे अग्नि! यज्ञ के जो मार्ग अर्थात्‌ हवि हैं, उन्हें मधु से मिलाकर अपनी शोभन-ज्वाला रूपी जीभ से उनका स्वाद लो. तुम सुंदर भावों द्वारा हमारी स्तुतियों और यज्ञ को उन्नत बनाओ एवं हमारे यज्ञ को देवों के भाग के योग्य बनाओ. (२)
O agni! Mix the paths of yajna i.e. havi with honey and taste them with your beaut-flame-like tongue. You upgrade our praises and yajna by beautiful emotions and make our yajna worthy of the part of the gods. (2)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 110
आ॒जुह्वा॑न॒ ईड्यो॒ वन्द्य॒श्चा या॑ह्यग्ने॒ वसु॑भिः स॒जोषाः॑ । त्वं दे॒वाना॑मसि यह्व॒ होता॒ स ए॑नान्यक्षीषि॒तो यजी॑यान् ॥ (३)
हे देवों को बुलाने वाले, प्रार्थनीय एवं वंदना के योग्य अग्नि! तुम वसुओं के साथ पधारो. हे महान्‌ अग्नि! तुम देवों के होता हो. हे अतिशय यज्ञकर्ता अग्नि! तुम हमारी प्रार्थना सुनकर इन देवों का यजन करो. (३)
O agni that calls the gods, praiseworthy and worthy of worship! You come with the vasuas. O great agni! You are gods. O agni, the most sacrificial agni! Listen to our prayers and worship these gods. (3)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 110
प्रा॒चीनं॑ ब॒र्हिः प्र॒दिशा॑ पृथि॒व्या वस्तो॑र॒स्या वृ॑ज्यते॒ अग्रे॒ अह्ना॑म् । व्यु॑ प्रथते वित॒रं वरी॑यो दे॒वेभ्यो॒ अदि॑तये स्यो॒नम् ॥ (४)
प्रातः वेदी को आच्छादित करने के लिए कुशों को पूर्व की ओर मुख करके बिछाया जाता है. यह सुंदर कुश अधिक फैलाया जाता है. यह अदिति तथा अन्य देवों के बैठने के लिए है. (४)
In the morning, kushas are laid facing east to cover the altar. This beautiful kush is more spread out. It is for Aditi and other gods to sit. (4)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 110
व्यच॑स्वतीरुर्वि॒या वि श्र॑यन्तां॒ पति॑भ्यो॒ न जन॑यः॒ शुम्भ॑मानाः । देवी॑र्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा दे॒वेभ्यो॑ भवत सुप्राय॒णाः ॥ (५)
सुंदर पत्नियां अच्छे कपड़े पहनती हैं एवं पतियों के सामने जिस प्रकार अपना शरीर प्रकट करती हैं, उसी प्रकार यज्ञशाला के सभी द्वारों पर देवियां प्रकट हों. हे द्वारदेवियो! द्वार इतने खुल जावें कि देवगण उन में होकर सरलता से जा सकें. (५)
Beautiful wives dress well and just as they reveal their bodies to the husbands, so the goddesses appear at all the gates of the yajnashala. O gate, ladies! Let the doors be open so that the devas can easily go through them. (5)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 110
आ सु॒ष्वय॑न्ती यज॒ते उपा॑के उ॒षासा॒नक्ता॑ सदतां॒ नि योनौ॑ । दि॒व्ये योष॑णे बृह॒ती सु॑रु॒क्मे अधि॒ श्रियं॑ शुक्र॒पिशं॒ दधा॑ने ॥ (६)
यज्ञ भाग की अधिकारिणी एवं शोभन-गति वाली उषा व रात्रि यज्ञशाला में बैठे. ये दिव्य नारी के समान शोभन दीप्ति वाली अत्यंत सुंदर एवं तेज को धारण करने वाली हैं. (६)
The authority of the yajna part and the shobhon-speeded Usha and sat in the night yajnashala. They are beautiful and sharp to be possessed of the same glory as the divine woman. (6)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 110
दैव्या॒ होता॑रा प्रथ॒मा सु॒वाचा॒ मिमा॑ना य॒ज्ञं मनु॑षो॒ यज॑ध्यै । प्र॒चो॒दय॑न्ता वि॒दथे॑षु का॒रू प्रा॒चीनं॒ ज्योतिः॑ प्र॒दिशा॑ दि॒शन्ता॑ ॥ (७)
देवों के होता अर्थात्‌ अग्नि और सूर्य सबसे पहले शोभन स्तुतियां बोलते हुए यज्ञकर्ता मनुष्य के लिए यज्ञ पूर्ण करने का काम करते हैं. ये दोनों पुरोहितं को यज्ञ कर्म में लगाते हैं. ये क्रियाकुशल हैं एवं पूर्व दिशा में प्राचीन प्रकाश उत्पन्न करते हैं. (७)
The gods, i.e., agni and the sun, first of all, speak the praises of shobhan, and the yajnakars do the work of completing the yajna for man. Both of them engage the priests in yajna karma. They are efficient and produce ancient light in the east direction. (7)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 110
आ नो॑ य॒ज्ञं भार॑ती॒ तूय॑मे॒त्विळा॑ मनु॒ष्वदि॒ह चे॒तय॑न्ती । ति॒स्रो दे॒वीर्ब॒र्हिरेदं स्यो॒नं सर॑स्वती॒ स्वप॑सः सदन्तु ॥ (८)
सूर्यदीप्ति हमारे यज्ञ में शीघ्र आवें. इड़ादेवी इस यज्ञ का ज्ञान करके यहां मनुष्य के समान पधारें. इन दोनों के साथ सरस्वती देवी मिलें एवं तीनों देवियां इस सुखकर यज्ञ में बैठे. (८)
May the sun shine come soon in our yajna. Idadevi comes here like a human being by knowing this yajna. Meet Goddess Saraswati with these two and the three goddesses sit in this happy yagna. (8)
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