ऋग्वेद (मंडल 10)
स॒ह॒स्र॒धा प॑ञ्चद॒शान्यु॒क्था याव॒द्द्यावा॑पृथि॒वी ताव॒दित्तत् । स॒ह॒स्र॒धा म॑हि॒मानः॑ स॒हस्रं॒ याव॒द्ब्रह्म॒ विष्ठि॑तं॒ ताव॑ती॒ वाक् ॥ (८)
पंद्रह हजार उक्थमंत्र द्यावा-पृथिवी के समान ही विस्तृत हैं. हमारे स्तोत्रों की महिमा हजारों प्रकार की है. स्तोत्रों के समान वाणी भी असीम है. (८)
Fifteen thousand ukthamtras are as wide as Dyava-Prithvivi. The glory of our hymns is of thousands of types. Like hymns, the voice is also limitless. (8)